Saturday, November 16, 2019

उत्तर प्रदेश: खेत में शौच के लिए गई दलित महिला का गैंगरैप, विरोध करने पर हुई पिटाई

 उत्तर प्रदेश  Reported by Babu Gautam

शामली जिले के अहाता गोस गढ़ गांव में चार लोगों ने 30 वर्षीय दलित महिला के साथ कथित रूप से सामूहिक बलात्कार किया.



प्रतीकात्मक फोटो

संविधान बाबासाहेब ने ही क्यों लिखा और कोई दूसरा क्यों नही लिख सका

संविधान बाबासाहेब ने ही क्यों लिखा और कोई दूसरा क्यों नही लिख सका ?
By Babu Gautam


पढ़िए और चार लोगो में सर उठाकर बताइए....
 बाबासाहब नं.१ थे
गांधी भी Barrister थे,
नेहरु भी Barrister थे,

राजगोपालाचारी,
मुंशी,
बी. एन. राव ,
जे . पी. कृपलानी
ऐसे बहुत सारे लोग थे ।

फिर बाबासाहब को ही संविधान क्यों लिखना पड़ा...?

1946 मे Constitution Assembly के election हुए ,
नेहरु और पटेल ने ये declare किया था कि ,

 "हमने संविधान सभा के सारे दरवाजे , खिडकिया बंद कर दिये हैं, देखते है बाबासाहब कैसे अन्दर आते हैं?"

ये उस वक्त की political स्थिति थी ।

क्योंकि वो सब लोग जानते थे कि " बाबासाहब वो व्यक्ति हैं जो हमारी
कोंग्रेस को नहीं मानते,
गांधी को नहीं मानते,
नेहरू को नहीं मानते
और
पुरे देश और दुनिया मे इनकी अपनी एक position है ।

Constitution तो वह तब लिखेंगे जब वे संविधान सभा मे आयेंगे , हम उनको संविधान सभा मे आने हि नही देंगे , हम उन्हे जीतने ही नहीं देंगें ..." ऐसा Open Declaration वल्लभभाई पटेल ने दिया था...!

इसलिये बाबासाहब को संविधान सभा मे जाने के लिये ventilator के सहारे जाना पडा, वो ventilator था,

"जैसुर-खुलना" बंगाल का इलाका, वहा से बाबासाहब को लड़ना पडा और बाबासाहब संविधान सभा मे चुने गये

3 जुन 1947 मे भारत और पाकिस्तान का बंटवारा करके बाबा साहब का वह इलाका पाकिस्थान के हवाले जान बूजकर किया गया था।

बाबासाहब कांग्रेस की गद्दारि से पाकिस्थान सविधान सभा के मेंबर बन गए थे।

तब बाबासाहब ने प्रेशर से काम किया ।

उस वक्त भारत मे 560 रियासतों में से हैद्राबाद, भोपाल, त्रवनकोर, कोल्हापूर, इनको भारत मे कैसे शामिल किया जाये , इनका Constitutional Settlement कैसे किया जाये इसके लिये British Cabinet की Meeting हुई ।

हैदराबाद, त्रावनकोर, कश्मीर इन तीनों राज्यों ने ये declare किया कि, हम भारत मे शामिल नहीं होंगे, हम पाकिस्तान की तरह स्वतंत्र होंगे ।

उस वक्त नेहरु, पटेल और गांधी किसी को ये समझ मे नहीं आ राहा था कि, इन 560 रियासतों को किस तरह settlement किया जाये..!

17 जुन 1947 में बाबासाहब ने International Press को संबोधित किया ।

जिसमें उन्होने तीन बाते बोली....

1) ब्रिटिश पार्लियामेंट को भारत के राज्य के संप्रभुता, सार्वभौम के उपर Law बनाने का कोइ अधिकार नहीं हैं ! ऐसा कोइ International Law नहीं हैं । जिसके तहत ये राज्य भारत मे रहेंगे, या नहीं रहेंगे ये decide करने का अधिकार और power ब्रिटीश पार्लियामेंट के पास नहीं हैं..!

2) और इन सारे राज्यों के राजाओ से अपिल है कि, "अगर तुम सोचते हो कि आप सयुक्त राष्ट्र मे जाओगे , और सयुक्त राष्ट्र भारत की सार्व भौमिकता नजर अंदाज करके आपको Independence बनायेगा तो आपसे बडा नासमझ कोइ नहीं है..! "

3) इन सारे राजाओं को बाबासाहब ने कहा, " आप सभी भारत मे शामिल हो जाओ , हम इसी देश के अंदर आपका Constitutional Settlement कर सकते हैं और हम एक बडा राष्ट्र बना सकते हैं..!" और यह सब बाबासाहब ने तब कहा था, जब नेहरु, गांधी और पटेल को समझ मे नहीं आ रहा था कि इन राज्यों का Integration कैसे किया जाये ...!

बाबासाहब आंबेडकर को संविधान लिखने का मौका क्यूं मिला इसके दो मुख्य कारण हैं..

1) उस समय बाबासाहब से बडा Constitutional expert, Constitutional philosopher दुनिया मे कोई नहीं था ....1927 Bombay legislative council से लेकर labour Ministry, Constitute assembly तक जो बाबासाहब आंबेडकर ने विविध legislative के काम किये थे उसे पूरी दुनिया जानती थी !
Govt. Of India act 1935 जो बना उसके लिये जो तीन Rountable Conferences हुइ उसमें बाबासाहब ने जो views दिये थे । उनका 50% amendment Govt. Of India act 1935 मे हूआ था !

2) मुसलमानों के बाद भारत में दूसरा सबसे बडा Minority,
schedule caste था,
और बाबासाहब आंबेडकर ने ये stand लिया था कि, अगर बनने वाले संविधान में हमारे संवैधानिक अधिकार सुरक्षित नहीं रखे गये तो, वह संविधान हमें मंजूर नहीं होगा ।

नेहरू और गांधी को ये डर था कि, यदि partition of India हुआ और उसके बाद अगर संवैधानिक solution नहीं मिला, तो भारत के 560 टुकडे हो सकते हैं ।

भारत का balkanization हो सकता हैं । और अगर ये हमे रोकना हैं, तो एक ही आदमी इस देश को बचा सकता है, और वो हैं Dr बाबासाहब आंबेडकर.....
और
इसलिए Dr. बाबासाहब आंबेडकर को संविधान लिखने का मौका मिला ...

संविधान सभा मे Drafting कमैटी को मिलाकर total 23 कमैटीया बनीं ।
जिसमें से २० कमैटी पे अकेले बाबासाहेब ने ही कामकिया और संविधान का ड्राफ्ट 141 दिनों मे तैयार किया ।

इससे ये मालुम होता हैं कि बाबासाहब दुनिया के सबसे बडे Constitutionality Expert थे....।

Drafting कमैटी मे जितने लोग थे उनमे से
कोइ बिमार हूआ,
कोइ छुट्टी पर चला गया,
कोइ विदेश गया ,
कोई अपने घर के कामों में व्यस्त रहे ।
किसी ने रिजाईन की वह जगह खाली वह रही ।

इसलिये खुद टि. टि. कुश्नमाचारी बोले कि " पूरा संविधान बनाने का काम अकेले बाबासाहब पर आ गया और उन्होने उसे बहुत खूबी से निभाया !"

इसलिये 1950 के बाद नया भारत बना।

जिसे हम लोकतांत्रिक और संविधानिक भारत कहते हैं, जिसका बाबासाहब ने निर्माण किया ।

"लोकतांत्रिक और संवैधानिक भारत के राष्ट्रपिता Dr. बाबासाहब आंबेडकर हैं", ये हमे समझने कि जरुरत हैं।

संविधान प्रेमियों "उत्तम" जानकारी शेयर करे
जय भीम!!

बाबा रामदेव ने कहा- "पेरियार को मानने वाले या मूलनिवासी कांसेप्ट वाले वैचारिक आतंकवादी"

बाबा रामदेव ने कहा-
"पेरियार को मानने वाले या मूलनिवासी कांसेप्ट वाले वैचारिक आतंकवादी"......

By Babu Gautam


बाबा रामदेव जी जो हरियाणा के अहीर हैं पर सनातन पंथ के प्रचारक व धर्म एवं योग की आड़ में एक बहुत बड़े नान टैक्सपेयी ब्यापारी,जिनका कहना है कि पेरियार को मानने वाले,नास्तिकता की विचारधारा वाले,अम्बेडकर वादी एवं मूलनिवासी कांसेप्ट वाले पूरी तरह से "वैचारिक आतंकवादी" हैं।
वैचारिक लोगो से बाबा रामदेव जी को बहुत कठिनाई है।दरअसल जो वैचारिक हो जाएगा वह रामदेव जी जैसों की दुकान कहाँ चलने देगा?विचार में वो ताकत है जो बड़े-बड़े आततायियों को भी अंगुलिमाल से सज्जन बना देता है।डकैत की डकैती बन्द न होने पाए,मुफ्तखोर की मुफ्तखोरी चलती रहे इसके लिए जरूरी है कि समाज बुद्धिहीन बना रहे।
चीन समुन्नत है तो नास्तिक विचारधारा बलजोर है,अमेरिका में अभी हुये सर्वेनुसार नास्तिकों या अनीश्वरवादियों की संख्या 2009 के मुकाबले 17 फीसद से बढ़कर 26 फीसद हो गया है लेकिन यहां आस्तिकों को इनसे कोई परेशानी नही है क्योकि यहां धर्म के नाम पर मुफ्त मलपूवा काटने का इंतजाम नही है इसलिए आस्तिक रहिए या नास्तिक कोई फर्क नही पड़ता पर भारत मे आस्तिकता के नाते एक पूरा बाजार डेवलप है जिसमे बिना पूंजी लगाए पुरोहित अरबों-खरबो में खेलता है जबकि श्रम करने वाला ईश्वर के नाम पर अपनी गाढ़ी कमाई अर्पित कर आता है।ऐसे में यदि कोई पेरियार वादी हो जाएगा तो उनका भट्ठा तो बैठना ही जो धर्म को ब्यापार बनाये हुये है।
बाबा रामदेव जो बचपन मे अहीर होने के नाते अपमानित हुये जिसे उन्होंने स्वयं पर बनी फिल्म में खुद ही स्वीकारा है का यह कथन कि नास्तिकता या अम्बेडकरवाद या बामसेफी विचारधारा बौद्धिक आतंकवाद है उनके वाह्य अंगों पर चढ़े भगवा रंग का असर है।
आज जब वेद,पुराण,रामायण सहित तार्किक साहित्य पढ़कर इस देश का उच्च शिक्षा ले रहा बहुजन नौजवान इस मनुवादी प्रपंच से निकलने को आंदोलित व उद्वेलित है तो मनुवादी लोग इन बहुजनो के कुल-परम्परा के लोगो को भिन्न-भिन्न क्षेत्रो में खड़ा कर अपने शोषक प्रबृत्ति को पुनर्जीवित रखने हेतु हर तरीके से प्रयासरत हैं।ये बहुजन समाज के विभीषण अपनी स्वामिभक्ति से मनुवाद को गुणकारी सिद्ध करने हेतु किसी सीमा तक चले जा रहे हैं जिसका एक।ज्वलंत उदाहरण बाबा रामदेव जी हैं।
बाबा रामदेव के बोल सुन मुझे अफसोस हो रहा है कि बाबा रामदेव कैसे अहीर कुल में जन्म ले लिए?जिस व्यक्ति को खुद के अपमान से सीख न मिली हो या जिसमे वर्गीय चेतना न हो उस व्यक्ति का क्या कहना?
मेरी समझ से बाबा रामदेव को हिंदुपरस्त दिखने से यह लाभ है कि उनके पिछड़ा/अहीर होने से उनके साथ जो जातिगत भेदभाव होता वह स्पष्ट रूप में नही दिखता है।

Friday, November 15, 2019

बिरसा मुंडा ने आंदोलन भूमाफियाओं, जमीदारों, सूदखोरों, पाखण्डियों और बनियों के द्वारा किये जा रहे आदिवासियों के शोषण, अत्याचार के विरुद्ध किया था


बिरसा मुंडा ने आंदोलन भूमाफियाओं, जमीदारों, सूदखोरों, पाखण्डियों और
बनियों के द्वारा किये जा रहे
आदिवासियों के शोषण, 
अत्याचार के विरुद्ध किया था ।

तथाकथित ऊँची जातियों के लोग

भोले भाले आदिवासियों की
जमीनें अपने नाम पर करवा कर
छीनते थे ।
फसल की पैदावार हड़पते थे ।
आदिवासियों में पाखण्ड और
अन्धविश्वास फैलाकर लूटने
का काम करते थे ।

ऐसे लोगों के विरूद्ध बिरसा मुंडा
ने आदिवासियों को संगठित करके आन्दोलन किया था ।

जिसे तथाकथित ऊँची जातियों
के लोगों ने सडयंत्र करके,
अंग्रेजों को गलत जानकारी
देकर, अंग्रेजों की और डायवर्ट
कर दिया ।

वर्तमान में आदिवासियों की
जमीनें कौन छिन्न रहा है ?

200 से भी अधिक जिलों के
आदिवासियों को नक्सलवाद
के नाम पर कौन लोग मार
रहे हैं ?

अंग्रेजों को आदिवासियों के
असली दुश्मनों यानी
असली समस्याओं की जानकारी
मिली तो अंग्रेजों ने आदिवासियों
की जल, जंगल और जमीन
के लिए कानून बना कर लागू
किये, लेकिन 5 वी एवं 6 टी
अनुसूची किसने लागू नहीं होने
दी ?

क्या आदिवासी अपने असली
दुश्मन को जानने की कोशिश
करेंगे ?

Thursday, November 14, 2019

विरप्पन गोंड ने 17वर्ष की उम्र में जंगलों में अपनी हकूमत कायम कर वहाँ आसपास के मनुवादी शासन-प्रशासन में भय पैदा कर दिया था

#वीर_विरप्पन_गोंड


विरप्पन गोंड ने 17वर्ष की उम्र में जंगलों में अपनी हकूमत कायम कर वहाँ  आसपास के मनुवादी  शासन-प्रशासन में भय पैदा कर दिया था।   श्रीनिवासन ब्राह्मण ने विरप्पन की बहन को प्यार के झांसे में रखकर व गर्भवती बना कर शादी से इन्कार कर दिया तो विरप्पन गोंड ने श्रीनिवासन की हत्या कर और टुकडे-टुकडे कर मछलियों को खिला दिया था। विरप्पन-गोंडर के प्रभाव के कारण ही वहाँ के आदिवासियों को अत्याचार, बलात्कार, हत्या व शोषण से मुक्ति मिल गयी थी और उन्हें मजदूरी का पूरा पैसा मिलने लगा था, जो मनुवादी शासन-प्रशासन नहीं चाहता था कि आदिवासियों की आर्थिक हालात में फायदा हो।

फिल्म अभिनेता राजकुमार का अपहरण करने के बाद विरप्पन गोंड ने सरकार के सामने राज्य की दस प्रमुख समस्या रखी और मांगे पूरा करने का अल्टीमेटम दिया।
मांगे निम्नलिखित थीं ।

1- कावेरी पानी का विवाद जबतक हल नहीं होता तबतक कर्नाटक सरकार तमिलनाडु के लिये प्रतिमाह 250TMC पानी दे।

2- सन 1991 में भडके कावेरी-पानी विवाद में जो तमिल पुलिस फायरिंग में मारे गये थे, उनके परिवारों को उचित मुआवजा दिया जावे।

3- स्पेशल टास्क फोर्स की ज्यादतियों की जांच करने वाले सदाशिव-आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ज्यादतियों से पीडित आदिवासियों को प्रति व्यक्ति 10 से 5 लाख रुपए का मुआवजा दिया जावे।

4- टाडा के तहत बन्द 51 आदिवासी  कैदियों को फौरन रिहा किया  जावे।  क्योंकि पुलिस ने अपनी नाकामी की वजह से निर्दोष आदिवासियों  को टाडा के तहत बंद कर दिया गया है।
5- पुलिस ज्यादतियों में मारे गये 9 अनुसूचित व जनजाति के लोगों को उचित मुआवजा दिया जावे।

6- नीलगीरि की पहाडियों पर चायपत्ती तौडने वाले मजदूरों को प्रति  एक किलाग्राम चसय पत्ती पर 15 रुपए दिये जाए ।

7- तमिल कवि और समाज सुधारक थिरुवेल्लुर की प्रतीमा बंगलौर में लगाई जावे

8- तमिल-नेशनल-लिब्रेशन आर्मी के तमिलनाडु जेल में बंद पांच लोगों को रिहा किया जाए।

9- कर्नाटक सरकार तमिल-भाषा  को अतिरिक्त राजभाषा का दर्जा दे।

10- मजदूरों की मजदूरी बढाई जाए ।

आदिवासी विरप्पन गोंड को पकडने के लिये सरकार ने स्पेशल टास्क फोर्स बनाई! मगर 150 बेकसूर अनुसूचित व जनजाति के लोगों के हत्यारे रणवीर सेना व उसके मुखिया पर मनुवादी सरकार व मीडिया ने कभी-भी हायतौबा नहीं मचाई । जबकि विरप्पन गोंड ने किसी आदिवासी व अनुसूचित जाति के लोगों की हत्या नहीं की, बल्कि उनकी हत्या की, जो मनुवादी  उन्हें पकडने व मारने आये थे और उन मनुवादियों की हत्या की जो अत्याचारी व बलात्कारी थे।

History India time के मुताबिक विरप्पन गोंड एक वीर मूलनिवासी महायोद्धा था और आदिवासियों में बहुत लोकप्रिय था।  महानारी फूलनदेवी ने बाईस. ठाकुर  मनुवादियों की हत्या कर अपने बलात्कार का बदला लिया और वहीं विरप्पन-गोंडर ने आदिवासी समुदाय की बेहतर सुरक्षा, सामाजिक, शैक्षिणक  व आर्थिक सुरक्षा प्रदान की। वहीं भारतीय मनुवादी मीडिया ने फूलनबाई को दस्यू-सुन्दरी व विरप्पन-गोंडर को चन्दन तस्कर घोषित कर वंचित-समाज के मुंह पर करारा तमाचा जड दिया था। आदिवासी राजा प्रवीरचन्द्र गोंड व अन्य 262 आदिवासी राजाओं का भारत में विलय के दौरान  क्या हश्र हुआ, यह कोई नहीं जानता है।

जिस सादगी से विरप्पन गोंड की विधवा पत्नी व दो मासूम लडकियां फटेहाल जिन्दगी जी रही हैं, उन्हें देखकर क्या आप यकीन करेंगे कि उसने करोडों रुपए कमाए हैं। यही स्थिति आदिवासी महा क्रांतिकारी बिरसा-मुन्डा के परिवार की है। मगर अधिकांश  वंचित-समाज या तो उन्हें जानता नहीं है और ना ही  कभी उन्हें  जानने व समझने की कोशिश की है कि तमिल समुदाय आदिवासी हैं।

तमिलनाडु के धर्मपुरी स्थित अस्पताल में विरप्पन की लाश को देखने आये ग्रामीणों ने एसटीएफ से विरप्पन की हत्या किये जाने पर बेहद आक्रोश जताया था।  ६२ साल  के वेंकटम्माल को लगता है कि उसने अपना बेटा खो दिया है ।

पुलिस ने विरप्पन के रिश्तेदारों को धमकी देते हुए, उसी रात को चारों लाशों को जलाने की कोशिश की, एसटीएफ जल्दबाजी में  तीन लाशें जलाने में कामयाब हो गये। मगर मानवाधिकार संस्थाओं के पदाधिकारियों व विरप्पन की पत्नी मुथुलक्ष्मी, भाई मदैयन व आदिवासियों  के विरोध के कारण  विरप्पन की लाश को दफनाया गया।  मगर पुलिस प्रशासन ने आखिरी संस्कार करने की अनुमति नहीं दी। मय्यत के रिश्तेदारों व डाक्टरों से हासिल जानकारी के मुताबिक विरप्पन  के हाथपैर कुचले गये थे तथा उसका लिंग मनुस्मृति के नियम के अनुसार  काटा गया था। विरप्पन की हथेलियां जली हुई पायी गयी थीं। उसके कुल्हे की हड्डी चूर-चूर पाई गयी, गर्दन पर सुईयां चुभोने के अनगिनत  निशान थे।  मगर रिश्तेदार यह बात किसी को उजागर नहीं कर पाए। क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं जयललिता सरकार एसटीएफ के हाथों उनका फर्जी  एनकाउंटर कर उन्हें विरप्पन का साथी घोषित न कर दे।

दीगर सूत्रों से इकट्ठा की गयी जानकारी के मुताबिक विरप्पन को उनके मुखबिर हुए साथियों ने विरप्पन को धोखे से बेहोशी की दवा दे दी और एसटीएफ के मनुवादी  अधिकारियों ने विरप्पन को गिरफ्तार कर बुरी तरह से यातनाएँ देकर मार दिया  गया था। एसटीएफ के एनकाउंटर की झूठी कहानी गढी गयी थी। बैंगलोर की प्रेस कान्फ्रेंस में एसटीएफ प्रमुख विजयकुमार ने पत्रकारों व जांच अधिकारियों  को खुलेआम धमकाते हुए कहा कि "हम सच्चाई की खोज करने वाली टीमों से निपटना अच्छी तरह से जानते हैं"।  ब्राह्मणवादी अखबार दिनारमाला में झूठे नामों से धमकियां दी गयी  कि अगर उन्होने सच्चाई की खोज करना जारी रखा तो उन्हें गिरफ्तार होना पडेगा। मरने वालों के रिश्तेदारों को धमकियां दी गयी कि वे सच्चाई की खोज करने वाली टीमों को कुछ नहीं बताएं ।
हाईकोर्ट में मुकदमा दर्ज करने के बाद ही रिश्तेदारों को विरप्पन-गोंडर व अन्य मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल पाई थी। एसटीएफ के अधिकारियों ने जांच एजेंसियों को एम्बुलेंस, घटना स्थल व सबूतों का मौका-मुआयना नहीं  करने दिया गया था।  मानवाधिकार आयोग की प्रार्थना शासन-प्रशासन ने ठुकरा दी गयी थी।

एसटीएफ ने पूरे जंगल को ही यातना शिवर में बदल दिया गया। एडवोकेट तथा मानवाधिकार कार्यकर्ता मान-बालामुरुगन ने अपनी किताब "सोलागार-डोड्डी " में क्रूर यातनाओं की तस्वीरें छापी हैं और बताया है कि एसटीएफ किसी भी आदिवासी को पकडकर क्रूर यातनाएं देकर मार डालती है और एनकाउंटर में मरा हुआ घोषित कर देती है। यातनायें देने का विवरण बहुत  डरावना है , जिसमें युवतियों से बलात्कार, युवक-युवतियों के अंगभंग करना, योनि अत्याचार, हत्या, विभिन्न भीषण  यातनाएं आदि शामिल हैं। कर्नाटक  सरकार ने सदाशिव-आयोग की जांच बन्द करवा दी है। क्योंकि कर्नाटक ,  केन्द्र सरकार व शासन-प्रशासन पर मनुवादी ब्राह्मणों की व्यवस्था कायम है।

उपरोक्त हालात कश्मीर से कन्याकुमारी और असम, पूर्वी, दक्षिणी, उत्तरी  व पश्चिमी क्षेत्रों के आदिवासी व अनुसूचित जातियों के लोगों के साथ आज भी कायम  हैं। मनुवादी आतंकवाद  आज शहरों व नगरों में विभिन्न संस्थाएँ, संगठन, संघ व सेना बनाकर आतंकवादी कार्यवाही कर रही है । क्योंकि किसी न किसी रुप में शासन-प्रशासन, कानून, मीडिया व सेना में मनुवादियों का वर्चस्व है और अधिकांश वंचित-समाज उनकी बन्दरसेना ,वोटबैंक व अंगरक्षक  बनी हुई है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर में अधिकांश ओबीसी, अनुसूचित जाति व आदिवासी समाज के लोग हैं, जो मनुवादी ब्राह्मणों के अत्याचार, शोषण, हत्या व बलात्कार  से पीडित होकर मुसलमान बन गये हैं, जबकि मनुवादी ब्राह्मण वहाँ आज भी शासन-प्रशासन में घूसपेठ किये हुए हैं।  पूर्वी, पश्चिम,  दक्षिणी व उत्तरी भारत में आदिवासियों को आतंकवादी, उग्रवादी, नक्सलवादी, माओवादी के नाम पर आप्फसा कानून के तहत मारा जा रहा है और समस्त भारत में आदिवासी व अनुसूचित जाति के लोगों का सामाजिक, धार्मिक, मानसिक, आर्थिक व शैक्षणिक रुप से शोषण, हत्या, बलात्कार कर प्रताडित किया जा रहा है।

क्या हम शहर में आकर सुरक्षित हों गये हैं!  यह आपका भ्रम मात्र है। क्योंकि शहर, कस्बों व गांवों में  भी किसी न किसी रुप में मनुवादी व्यवस्था आपका व आपके बच्चों का सामाजिक, धार्मिक, मानसिक, आर्थिक व शैक्षिणक रुप से शोषण हो रहा है ।

आप प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से मनुवादी ब्राह्मणों के शासन व प्रशासन में बन्दरसेना, वोटबैंक व अंधभक्त बनकर सहयोग कर रहे हैं ?

#समाज_हित_में ।।

Sunday, November 10, 2019

यशवंतराव जानते थे कि यही दलित बाबा साहब की जयंती मे 10 रुपये का चंदा देने मे नाक सिकोडेंगे और मंदिर बनाने के लिये 5000-10,000 रुपये आसानी से देंगे...

आप मे से ज्यादातर लोग बाबासाहब डॉ0 भीमराव अम्बेडकर ( 1891-1956) को जानते होंगे पर आपने कभी उनके पुत्र यशवंतराव अम्बेडकर (1912-1977) का नाम नही सुना होगा...... 
By Babu Gautam


कारण यह है कि यशवंतराव अम्बेडकर ने स्वयम को बहुजन आंदोलन से अलग रखा....वो अपने पिता से खिन्न थे और घर मे पिता पुत्र के बीच बहुत विवाद होते थे......

1935 मे माता  रमाबाई की म्रत्यु के बाद विवाद इतना बढा कि बाबा साहब दुखी हो गये और फिर  उन्होने यशवंतराव जी को व्यस्त रखने  के लिये के लिये उनके नाम पे  एक निजी प्रिंटिंग प्रेस खोल दिया.... उस प्रिंटिंग प्रेस के संचालन मे यशवंतराव जी ने स्वयम को  पुरी तरह झोंक दिया और  दूसरे घर मे रहने लगे...

आखिर क्या वजह थी कि बाबा साहब का एकमात्र पुत्र  यशवंतराव अम्बेडकर उनसे नफरत करता था ?

वजह जान के आप भी मानने लगोगे कि यशवंतराव अम्बेडकर का गुस्सा ज़ायज़ था और वो सच बोलता थे...

बाबासाहेब का विवाह 1907 मे हुआ था और विवाह के 5 वर्ष बाद 1912 मे यशवंतराव अम्बेडकर जी पैदा हुये थे.....

यशवंतराव ने अपनी आंखो के सामने अपने तीन भाईयो गंगाधर,रामादेश, राजरतन और एक बहन इंदु को भूख और बीमारी से दम तोडते देखा...... वह रोकता था अपने पिता को और कहता था कि क्यु करते हो व्यर्थ मेहनत|  ये एहसान फरामोश दलित आपको भूल जायेंगे और दिन रात मंदिर मे घुसने के सपने देखेंगे...और बाद मे यही हुआ...

यशवंतराव सच बोलते थे...

यशवंतराव ने देखा कि उसके भाई राजरतन की लाश को शमशान ले जाने की जगह उसके पिता दलितो के लिये बनाये गये साईमन कमीशन की मीटिंग अटेंड करने चले गये|  राजरतन की लाश को शमशान उसके चाचा और दूसरे लोग ले गये थे......

यशवंतराव ने देखा कि उसके भाई राजरतन की लाश को ढांकने के कफन के लिये उनके पास पेसा नही था...उसने देखा कि  उसकी माता ने अपनी साडी का एक छोटा टुकडा  फाड के कफन की व्यवस्था की...  वह कोसता था अपने पिता को और कहता था कि इन एहसान फरामोश दलितो की भलाई के  लिये क्यु मेरी माता को रुला रहे हो....ये एहसान फरामोश दलित आपको भूल जायेंगे और उपवास रखने मे सवर्नो से होड करेंगे.... और बाद मे यही हुआ... यशवंतराव सच बोलते थे...

यशवंतराव ने बचपन से ही देखा कि किस तरह उसके पिता अपने परिवार को नज़र अंदाज़ करके दलितो के उत्थान के लिये प्रयासरत थे...बाबा साहब सन 1917 से ही अंग्रेज सरकार को भारत मे दलितो को अधिकार दिलाने के लिये हर महीने पत्र लिखते थे.. 1917 से ले के 1947 तक , 30 साल तक लिखे पत्रो का ही असर था कि आजादी देते वक़्त अंग्रेजो ने शर्त रख दी कि सम्विधान बाबा साहब से लिखाया जायेगा और दलितो को आरक्षण दिया जायेगा....

यशवंतराव ने अपनी आंखो से देखा कि उसका पिता तो स्कोलरशिप पे कोलम्बिया मे पढ रहा है और  मुम्बई जेसे बडे शहर मे अपना खर्च चलाने के लिये  उसकी माता गोबर के उपले बना बना के बेचती है..उसने देखा कि उसकी मां अपने बच्चो के इलाज़ के लिये अपने रिश्तेदारो से बार बार वित्तीय सहायता हेतु विनती करती है और रिश्तेदार इधर उधर के बहाने बना के टाल देते हैं ...वह कोसता था अपने पिता को और कहता था कि इन एहसान फरामोश दलितो के लिये क्यु अपने परिवारजनो को दुखी कर रहे हो, ये एहसान फरामोश दलित आपको भूल जायेंगे और दिन रात देवी देवताओ के भजन गायेंगे....और बाद मे यही हुआ....यशवंतराव सच बोलते थे...

यशवंतराव ने अपनी आंखो से अपनी माता रमाबाई को सन 1935 मे भूख और बीमारी से दम तोडते देखा......

इन सब अनुभवो ने छोटी उम्र मे ही यशवंतराव को दुनिया की कडवी हक़ीकत से वाकिफ करा दिया..वो जानता था कि बाबा साहब चाहे अपनी जान न्योछावर कर  दे दलितो के उत्थान के लिये, ये एहसान फरामोश दलित कभी उनका बलिदान ना समझेंगे...ये गद्दार लोग बाबा साहब को भूल जायेंगे और बढ चढ के जगराता आदि करायेंगे...और बाद मे यही हुआ..... यशवंतराव सच बोलते थे...
.
यशवंतराव जानते थे कि यही दलित बाबा साहब की जयंती मे 10 रुपये का चंदा देने मे नाक सिकोडेंगे और मंदिर बनाने के लिये 5000-10,000 रुपये आसानी से देंगे...और बाद मे यही हुआ ... यशवंतराव सच बोलते थे .....
.
यशवंतराव जानते थे कि जब किसी शहर मे बाबा साहब की जयंती मनायी जायेगी तो शहर के 20-30 हजार दलितो मे से केवल 100-150 लोग ही जयंती मनाने आयेंगे ताकि कोई उन्हे महार,चमार,भंगी ना समझ बैठे....और बाद मे यही हुआ ....यशवंतराव सच बोलते थे....
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यशवंतराव जानते थे कि आरक्षण का फायदा उठा के यही दलित लोग सबसे पहले अपने लिये केवल गाडी और बंगले का इंतेज़ाम करेंगे और दुसरे दलित भाईयो की परछाई से भी दूर रहेंगे.... एक बंगला बन जाने के बाद दुसरे बंगले का इंतेज़ाम करेंगे... और दूसरा बंगला बन जाने के बाद तीसरे बंगले का इंतेज़ाम करेंगे|  और बाद मे यही हुआ  यशवंतराव सच बोलते थे....

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